केदारनाथ यात्रा-2026 के साइनेज टेंडर पर उठे सवाल, 30 लाख की निविदा, 55 लाख का वर्क ऑर्डर, CDO रुद्रप्रयाग के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच की मांग……..


रुद्रप्रयाग। केदारनाथ यात्रा-2026 के लिए जारी किए गए लगभग 55 लाख रुपये के साइनेज, फ्लेक्स, बैनर एवं सूचना बोर्ड टेंडर को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता  द्वारा मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव ग्रामीण विकास, निदेशक सतर्कता एवं अन्य उच्च अधिकारियों को भेजी गई शिकायत में टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं, प्रतिस्पर्धा सीमित करने तथा सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग की जांच की मांग की गई है।


शिकायत के अनुसार, GeM Bid No. GEM/2026/B/7412807 को “Non Paper Printing Services – Flex & Banners” श्रेणी में प्रकाशित किया गया था, जबकि कार्य के दायरे में ACP बोर्ड, आयरन स्ट्रक्चर, दिशा-सूचक बोर्ड, साइनेज इंफ्रास्ट्रक्चर, फैब्रिकेशन और इंस्टॉलेशन जैसे कार्य भी शामिल थे। शिकायतकर्ता का आरोप है कि कार्य की वास्तविक प्रकृति और निविदा श्रेणी में असंगति होने से प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।

30 लाख की निविदा, 55 लाख का अनुबंध

निविदा दस्तावेज में अनुमानित लागत 30 लाख रुपये दर्शाई गई थी, जबकि बाद में जारी अनुबंध में कुल मूल्य 55 लाख रुपये निर्धारित किया गया। शिकायतकर्ता ने प्रश्न उठाया है कि लगभग 83 प्रतिशत की वृद्धि किस आधार पर की गई और इसके लिए किस स्तर से वित्तीय स्वीकृति प्राप्त की गई।

दस्तावेजों के अनुसार निविदा में “Estimated Bid Value” ₹30,00,000 अंकित थी। दूसरी ओर जारी अनुबंध में कुल मूल्य ₹55,00,000 दर्शाया गया है। इस प्रकार अनुमानित लागत और अंतिम अनुबंध राशि के बीच ₹25 लाख रुपये का अंतर सामने आया है, जो लगभग 83 प्रतिशत अधिक है।

मामले को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सरकारी निविदा में अनुमानित लागत केवल औपचारिक आंकड़ा नहीं होती, बल्कि उसी के आधार पर पात्रता शर्तें, अनुभव, टर्नओवर, EMD, प्रतिस्पर्धा और वित्तीय मूल्यांकन की रूपरेखा तय होती है। ऐसे में यदि अंतिम अनुबंध राशि अनुमानित लागत से अत्यधिक अधिक हो जाए, तो उसके पीछे का आधार स्पष्ट होना आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न यह भी उठ रहा है कि यदि कार्य का वास्तविक मूल्य 55 लाख रुपये था, तो निविदा दस्तावेज में 30 लाख रुपये की अनुमानित लागत क्यों प्रदर्शित की गई? क्या बाद में कोई संशोधित DPR (Detailed Project Report), संशोधित लागत आकलन (Revised Cost Estimate), अतिरिक्त कार्य स्वीकृति या पुनरीक्षित वित्तीय स्वीकृति जारी की गई थी? यदि हाँ, तो उसका विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

सूत्रों के अनुसार शिकायतकर्ताओं ने इस पूरे प्रकरण की प्रशासनिक एवं वित्तीय जांच की मांग की है। शिकायत में कहा गया है कि DPR, Cost Analysis, Financial Approval, Comparative Statement तथा कार्यादेश से संबंधित समस्त अभिलेखों की जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि 30 लाख रुपये की निविदा आखिर 55 लाख रुपये के अनुबंध में कैसे परिवर्तित हुई।

मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि निविदा प्रक्रिया के दौरान संभावित बोलीदाताओं ने अपनी वित्तीय रणनीति और प्रतिस्पर्धा का आकलन 30 लाख रुपये की अनुमानित लागत को ध्यान में रखकर किया होगा। ऐसे में बाद में अनुबंध मूल्य में भारी वृद्धि निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता के प्रश्न भी खड़े करती है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि 30 लाख रुपये की अनुमानित निविदा अंततः 55 लाख रुपये के वर्क ऑर्डर में किस नियम, आदेश और वित्तीय स्वीकृति के आधार पर बदली गई?

अनुबंध अभिलेखों के अनुसार वित्तीय अनुमोदन CDO रुद्रप्रयाग स्तर से दर्शाया गया है, जबकि IFD Concurrence का उल्लेख “No” के रूप में किया गया है।

 

अकेली फर्म की वित्तीय बोली खुलने पर उठे सवाल

शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि टेंडर में भाग लेने वाली तीन फर्मों में से दो को तकनीकी मूल्यांकन के दौरान अयोग्य (Technically Disqualified) घोषित कर दिया गया, जबकि केवल एक फर्म को तकनीकी रूप से योग्य माना गया और बाद में उसी एकमात्र फर्म की वित्तीय निविदा (Financial Bid) खोलकर कार्यादेश जारी कर दिया गया।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार निविदा में तीन फर्मों ने भाग लिया था। तकनीकी परीक्षण के बाद दो फर्में बाहर हो गईं और केवल एक फर्म ही तकनीकी रूप से पात्र बची। इसके बाद उसी फर्म की वित्तीय बोली खोली गई और अनुबंध प्रदान कर दिया गया। इस प्रक्रिया को लेकर अब कई प्रशासनिक एवं कानूनी प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सार्वजनिक खरीद प्रक्रियाओं का मूल उद्देश्य अधिकतम प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना होता है। उनका दावा है कि उत्तराखंड अधिप्राप्ति नियमावली एवं पारदर्शी निविदा सिद्धांतों के अनुसार जब किसी निविदा में प्रभावी प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाए और केवल एक पात्र बोलीदाता शेष रह जाए, तब सामान्यतः मामले की समीक्षा, कारणों का परीक्षण अथवा आवश्यक होने पर पुनर्निविदा (Re-Tendering) जैसे विकल्पों पर विचार किया जाता है।

इसी आधार पर शिकायतकर्ताओं ने प्रश्न उठाया है कि जब केवल एक फर्म तकनीकी रूप से योग्य रह गई थी, तब टेंडर समिति ने वित्तीय बोली खोलने का निर्णय किस आधार पर लिया? क्या इसके लिए किसी सक्षम प्राधिकारी से विशेष अनुमति प्राप्त की गई थी? क्या इस संबंध में कोई समिति बैठक, नोटशीट, विधिक राय या प्रशासनिक आदेश उपलब्ध है?

मामले में यह भी मांग उठाई गई है कि तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित की गई दोनों फर्मों के मूल्यांकन अभिलेख सार्वजनिक किए जाएं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उन्हें किन कारणों से अयोग्य ठहराया गया। साथ ही उस समिति के निर्णयों की भी जांच की जाए जिसने केवल एक पात्र बोलीदाता की स्थिति में वित्तीय बोली खोलने की अनुमति दी।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी टेंडर में प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाती है तो विभाग को यह सुनिश्चित करना होता है कि सरकारी हितों की रक्षा हो, उचित मूल्य प्राप्त हो तथा पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत रहे। ऐसे मामलों में सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिए गए निर्णयों का दस्तावेजी रिकॉर्ड अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।



50 हजार वर्गमीटर कार्य मात्रा पर भी सवाल

निविदा में कुल 50,000 वर्गमीटर प्रिंटिंग क्षेत्र निर्धारित किया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि उपलब्ध नमूना डिजाइनों और प्रस्तावित बोर्डों की संख्या को देखते हुए इतनी बड़ी मात्रा का आधार स्पष्ट नहीं है। इस संबंध में DPR, लागत विश्लेषण और मात्रा निर्धारण की प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग की गई है।

यदि 10 फीट × 2 फीट (लगभग 1.858 m²) के बोर्ड मानें, तो 50,000 m² क्षेत्रफल लगभग 26,900 ऐसे बोर्डों के बराबर होगा।

पांच वर्ष अनुभव और 50 लाख टर्नओवर की शर्त

निविदा में भाग लेने के लिए न्यूनतम 50 लाख रुपये वार्षिक टर्नओवर और 5 वर्ष का अनुभव अनिवार्य किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि ऐसी शर्तें स्थानीय MSME इकाइयों और छोटे सेवा प्रदाताओं की प्रतिस्पर्धा को सीमित कर सकती हैं।

उत्तराखंड में कार्यालय होना अनिवार्य

टेंडर में एक अतिरिक्त शर्त जोड़ी गई थी कि सेवा प्रदाता का कार्यालय उत्तराखंड राज्य में होना चाहिए। शिकायतकर्ता ने इसे भी प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाली शर्त बताते हुए इसकी वैधानिकता की जांच की मांग की है।

MSME सत्यापन पर प्रश्न

अनुबंध दस्तावेजों में चयनित फर्म M/s Paru Enterprises का MSME Status “Not Verified” अंकित है। शिकायत में कहा गया है कि जब निविदा में MSE Purchase Preference लागू थी, तो चयनित फर्म की पात्रता और सत्यापन प्रक्रिया की जांच की जानी चाहिए।

सब-कॉन्ट्रैक्टिंग पर रोक, फिर भी जांच की मांग

अनुबंध की शर्तों में स्पष्ट उल्लेख है कि कार्य को किसी अन्य एजेंसी को सौंपना या सब-कॉन्ट्रैक्ट करना अनुबंध उल्लंघन माना जाएगा। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि यह सत्यापित किया जाए कि पूरा कार्य वास्तव में चयनित फर्म द्वारा ही किया गया या किसी तीसरे पक्ष से कराया गया।

भौतिक सत्यापन और भुगतान रोकने की मांग

शिकायत में सभी साइनेज, सूचना बोर्ड, रनिंग बोर्ड और प्रचार सामग्री का स्थल निरीक्षण कराने तथा कार्य की मात्रा और गुणवत्ता का स्वतंत्र सत्यापन कराने की मांग की गई है। साथ ही जांच पूरी होने तक शेष भुगतान रोकने की भी मांग की गई है।

उच्च स्तरीय जांच की मांग

मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि निविदा प्रक्रिया के दौरान संभावित बोलीदाताओं ने अपनी वित्तीय रणनीति और प्रतिस्पर्धा का आकलन 30 लाख रुपये की अनुमानित लागत को ध्यान में रखकर किया होगा। ऐसे में बाद में अनुबंध मूल्य में भारी वृद्धि निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता के प्रश्न भी खड़े करती है।

अब यह मामला शासन एवं सतर्कता एजेंसियों के संज्ञान में पहुंच चुका है। यदि जांच बैठती है तो DPR तैयार करने वाले अधिकारियों, लागत का आकलन करने वाली समिति तथा अंतिम वित्तीय स्वीकृति प्रदान करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।

शिकायतकर्ता ने मुख्य सचिव, ग्रामीण विकास विभाग, निदेशक सतर्कता, मुख्य विकास आयुक्त तथा जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग से पूरे मामले की प्रशासनिक, वित्तीय और सतर्कता जांच कराने की मांग की है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि निविदा प्रक्रिया, तकनीकी मूल्यांकन, वित्तीय स्वीकृति और कार्य निष्पादन में सभी नियमों का पालन किया गया या नहीं।

(नोट: उपरोक्त समाचार शिकायत एवं उपलब्ध दस्तावेजों में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र सरकारी जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होना शेष है।)