धामी सरकार की ‘भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता’ की नीति के बीच शहरी विकास मंत्री कैड़ा के विभाग में ₹1.94 करोड़ की परियोजना पर गंभीर सवाल


नगर पंचायत गूलरभोज की डीपीआर और निविदा प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच की मांग; पिता-पुत्र से जुड़ी फर्मों के कोटेशन, ₹7–8 हजार के बताए जा रहे विद्युत पोल की ₹26 हजार दर, ₹49 हजार के नियंत्रण पैनल और ₹490 प्रति मीटर केबल को लेकर उठे सवाल…….

देहरादून/गूलरभोज/ऊधम सिंह नगर।
उत्तराखण्ड को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने और भ्रष्टाचार के प्रति ‘शून्य सहनशीलता’ की नीति अपनाने का दावा करने वाली मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के सामने अब शहरी विकास विभाग की कार्यप्रणाली से जुड़ा एक और गंभीर मामला सामने आया है।

मुख्यमंत्री जहां सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और पारदर्शी शासन की प्रतिबद्धता दोहराते रहे हैं, वहीं उनके मंत्रिमंडल के शहरी विकास विभाग के अंतर्गत आने वाली नगर पंचायत गूलरभोज में लगभग ₹1.94 करोड़ की एलईडी मार्ग प्रकाश व्यवस्था परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) और निविदा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की शिकायत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मुख्यमंत्री धामी की शून्य सहनशीलता नीति पर उठे सवाल, क्या गूलरभोज प्रकरण में होगी निष्पक्ष जांच?

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति को अपनी प्रमुख प्रशासनिक प्राथमिकताओं में शामिल करती रही है। ऐसे में नगर पंचायत गूलरभोज की लगभग ₹1 करोड़ 94 लाख 39 हजार 189 रुपये की परियोजना में कथित अत्यधिक दर निर्धारण, फर्मों के बीच संभावित मिलीभगत, निविदा की पात्रता शर्तों और खरीद प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने शासन की निगरानी व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति पर जोर दे रहे हैं, तब उनके ही मंत्रिमंडल के अधीन शहरी विकास विभाग में करोड़ों रुपये की परियोजनाओं की दर निर्धारण एवं निविदा प्रक्रिया को लेकर उठ रही शिकायतों पर कितनी तत्परता से जांच और कार्रवाई की जा रही है?

गूलरभोज प्रकरण में डीपीआर तैयार करने के लिए कथित रूप से आपस में संबंधित फर्मों से कोटेशन लेने, सरकारी ई-बाजार (GeM) पर उपलब्ध कम दरों की अनदेखी करने, विद्युत उपकरणों की अत्यधिक दरें निर्धारित करने तथा निविदा की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

ऐसे में यह मामला केवल नगर पंचायत के अधिकारियों तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि विभागीय मंत्री और शासन की निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता से भी जुड़ जाता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की घोषित शून्य सहनशीलता नीति गूलरभोज प्रकरण में भी स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय जांच के रूप में दिखाई देगी अथवा शिकायत केवल विभागीय पत्राचार तक सीमित रह जाएगी?

हालांकि शिकायत में लगाए गए आरोप अभी स्वतंत्र जांच से प्रमाणित नहीं हुए हैं। इसलिए संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी जांच एवं प्रमाणित तथ्यों के आधार पर ही निर्धारित की जानी चाहिए।

शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा के लगभग छह माह के कार्यकाल में विभागीय पारदर्शिता पर फिर उठे सवाल………

उत्तराखण्ड में शहरी विकास विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर सामने आ रहे विवादों और अनियमितताओं के आरोपों के बीच अब नगर पंचायत गूलरभोज की लगभग ₹1.94 करोड़ की एलईडी मार्ग प्रकाश व्यवस्था परियोजना ने विभागीय पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

मार्च 2026 में शहरी विकास विभाग की जिम्मेदारी संभालने वाले कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा के लगभग छह माह के कार्यकाल के दौरान विभाग में अधिशासी अधिकारियों की नियुक्तियों, तबादलों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर भी विवाद सामने आने की बात कही गई है।

अब गूलरभोज परियोजना में कथित अत्यधिक दर निर्धारण, निविदा प्रक्रिया और संभावित सरकारी वित्तीय क्षति की शिकायत ने विभागीय निगरानी व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा अपने विभाग के अंतर्गत आने वाले नगर निकायों में सामने आ रही वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतों पर कितनी गंभीरता से कार्रवाई सुनिश्चित कर रहे हैं?

क्या संबंधित अधिकारियों के निर्णयों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी और यदि अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई होगी?

गूलरभोज प्रकरण में अभी किसी मंत्री अथवा अधिकारी की व्यक्तिगत संलिप्तता या भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ है। फिर भी विभाग के राजनीतिक एवं प्रशासनिक नेतृत्व की जवाबदेही का प्रश्न महत्वपूर्ण है।

शिकायतकर्ता ने मांग की है कि प्रकरण की जांच संबंधित स्थानीय अधिकारियों के बजाय स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति से कराई जाए, ताकि निष्कर्ष निष्पक्ष हों और सरकारी धन के उपयोग को लेकर उठे सवालों का स्पष्ट उत्तर मिल सके।

अब देखना होगा कि शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा इस मामले में स्वतंत्र जांच और पारदर्शी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

गूलरभोज में ₹1.94 करोड़ की मार्ग प्रकाश परियोजना पर गंभीर सवाल…….

नगर पंचायत गूलरभोज की लगभग ₹1,94,39,189 की एलईडी मार्ग प्रकाश एवं विद्युत उपकरण परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तथा निविदा प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं।

शिकायतकर्ता ने परियोजना की लागत निर्धारण प्रक्रिया, डीपीआर तैयार करने वाली फर्म के चयन, विभिन्न विद्युत सामग्रियों की दरों, तकनीकी आवश्यकताओं और निविदा की पात्रता शर्तों पर सवाल उठाते हुए उच्चस्तरीय तकनीकी, वित्तीय एवं सतर्कता जांच की मांग की है।

शिकायत में नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारी राजकुमार भारती, नगर पंचायत अध्यक्ष सतीश चुग, डीपीआर तैयार करने से संबंधित अंकुर शर्मा तथा अन्य अधिकारियों एवं संबंधित फर्मों की भूमिका की जांच कराने की मांग की गई है।

हालांकि आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का स्पष्टीकरण अभी सामने आना बाकी है।

डीपीआर बनाने के लिए तीन कोटेशन, दो फर्मों के बीच पारिवारिक संबंधों का सवाल…………

प्रकरण का पहला बड़ा सवाल डीपीआर तैयार करने के लिए अपनाई गई कोटेशन प्रक्रिया से जुड़ा है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि नगर पंचायत द्वारा तीन फर्मों से ऑफलाइन कोटेशन प्राप्त किए गए, लेकिन इनमें से दो फर्मों के बीच कथित रूप से पिता-पुत्र का संबंध सामने आया है।

उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, युग एसोसिएट्स (Yug Associates) की ओर से कोटेशन प्रस्तुत करने वाले अंकुर शर्मा के आधार कार्ड में उनके पिता का नाम विनोद कुमार शर्मा अंकित है।

वहीं, तीसरे स्थान पर रही फर्म बायोटेक वेस्ट मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड (Biotech Waste Management Private Limited) की ओर से प्रस्तुत निविदा दस्तावेजों में विनोद कुमार शर्मा का आधार कार्ड अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में संलग्न किए जाने का दावा किया गया है।

इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता के अनुसार विनोद कुमार शर्मा के आधार कार्ड में अंकित पता तथा युग एसोसिएट्स के वस्तु एवं सेवा कर पंजीकरण प्रमाणपत्र में दर्ज व्यावसायिक पता एक ही है।

इन दस्तावेजी समानताओं के आधार पर दोनों फर्मों के बीच निकट पारिवारिक एवं व्यावसायिक संबंध होने की आशंका व्यक्त की गई है।

शिकायतकर्ता का सवाल है कि यदि तीन में से दो कोटेशनदाता फर्मों के बीच इस प्रकार के संबंध थे, तो क्या वास्तव में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष प्रतिस्पर्धात्मक कोटेशन प्राप्त किए गए थे?

क्या नगर पंचायत ने कोटेशन स्वीकार करने से पहले संबंधित फर्मों के स्वामित्व, अधिकृत प्रतिनिधियों, व्यावसायिक पते तथा आपसी संबंधों का सत्यापन किया था?

क्या डीपीआर तैयार करने वाली फर्म का चयन वास्तविक प्रतिस्पर्धा के आधार पर हुआ अथवा केवल तीन कोटेशन की औपचारिकता पूरी की गई?

हालांकि समान पता, पारिवारिक संबंध अथवा प्रतिनिधित्व अपने आप में मिलीभगत का निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए तीनों फर्मों के स्वामित्व, कोटेशन, दरों, दस्तावेजों और चयन प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी।

₹7–8 हजार के बताए जा रहे सात मीटर अष्टकोणीय विद्युत पोल की डीपीआर में ₹26 हजार दर……..

परियोजना में प्रस्तावित सात मीटर ऊंचे अष्टकोणीय विद्युत पोल की कीमत को लेकर भी बड़ा सवाल उठाया गया है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, डीपीआर में प्रति पोल लगभग ₹26,000, वस्तु एवं सेवा कर अतिरिक्त, की दर निर्धारित की गई है। वहीं बाजार में तुलनीय पोल की कीमत लगभग ₹7,000 से ₹8,000 होने का दावा किया गया है।

शिकायत में कहा गया है कि लगभग 70 किलोग्राम वजन वाले पोल की सामग्री लागत ₹100 प्रति किलोग्राम के अनुमान पर करीब ₹7,000 बैठती है।

इस आधार पर ₹26,000 की दर, ₹7,000 की तुलना में लगभग 271 प्रतिशत अधिक है।

शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया है कि सरकारी ई-बाजार पोर्टल पर उन्हीं निर्माताओं के तुलनीय पोल लगभग ₹8,000 में उपलब्ध बताए गए हैं, जबकि ₹26,000 से लेकर ₹54,000 तक की ऊंची दर वाली उत्पाद प्रविष्टियों का संदर्भ डीपीआर तैयार करने में लिया गया।

₹8,000 के मुकाबले ₹26,000 की दर 225 प्रतिशत और ₹54,000 की दर 575 प्रतिशत अधिक बैठती है।

हालांकि इन दरों को वास्तविक वित्तीय अनियमितता का प्रमाण मानने से पहले पोल के वजन, इस्पात की श्रेणी, मोटाई, जस्तीकरण, आधार प्लेट, आधार बोल्ट, परिवहन और स्थापना सहित सभी तकनीकी एवं लागत घटकों की तुलना जरूरी होगी।

₹49 हजार के सीसीएमएस नियंत्रण पैनल पर सवाल, एकल-फेज और त्रि-फेज विनिर्देशों में संभावित अंतर…..

डीपीआर में केंद्रीकृत नियंत्रण एवं निगरानी प्रणाली (CCMS) के पैनल के लिए लगभग ₹49,000 प्रति नग की दर को लेकर भी शिकायत की गई है।

शिकायतकर्ता का दावा है कि तुलनीय सामान्य त्रि-फेज सीसीएमएस पैनल बाजार में लगभग ₹10,000 से ₹12,000 तक उपलब्ध हो सकते हैं।

इस आधार पर डीपीआर की दर बताई गई बाजार दर से लगभग 308 से 390 प्रतिशत अधिक है।

इसके अतिरिक्त शिकायत में तकनीकी विसंगति की आशंका भी व्यक्त की गई है। आरोप है कि कुछ स्थानों पर एकल-फेज सीसीएमएस पैनल की आवश्यकता होने के बावजूद त्रि-फेज पैनल की दर को आधार बनाया गया।

इस मामले में वास्तविक विद्युत भार, दूरस्थ निगरानी प्रणाली, संचार उपकरण, सॉफ्टवेयर, नियंत्रक, सुरक्षा व्यवस्था और वारंटी जैसे तकनीकी घटकों की जांच आवश्यक बताई गई है।

₹70 से ₹150 प्रति मीटर की बताई जा रही केबल, डीपीआर में ₹490 प्रति मीटर

परियोजना में प्रस्तावित 16 वर्ग मिलीमीटर, चार-कोर आर्मर्ड केबल की कीमत को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

शिकायतकर्ता के अनुसार, खुले थोक बाजार में बिना ब्रांड वाली केबल लगभग ₹70 प्रति मीटर और हैवेल्स, हैलोनिक्स, पॉलीकैब तथा आरआर जैसे ब्रांडों की तुलनीय केबल लगभग ₹150 प्रति मीटर तक उपलब्ध होने का दावा किया गया है।

इसके विपरीत डीपीआर में ₹490 प्रति मीटर की दर रखे जाने का आरोप है।

यदि ₹150 की बताई गई थोक दर से तुलना की जाए तो डीपीआर की दर लगभग 227 प्रतिशत अधिक है। ₹70 की दर से तुलना करने पर यह अंतर 600 प्रतिशत तक पहुंचता है।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि निर्माता कंपनियों की प्रकाशित मूल्य सूचियों और वास्तविक थोक खरीद दरों में महत्वपूर्ण अंतर हो सकता है।

कुछ उत्पादों पर मात्रा और व्यापारिक शर्तों के आधार पर 50 से 70 प्रतिशत तक छूट मिलने का दावा किया गया है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि डीपीआर तैयार करते समय वास्तविक थोक दरों और उपलब्ध व्यापारिक छूट का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया।

हालांकि केबल की तुलना में तांबे अथवा एल्युमिनियम के चालक, विद्युतरोधन, धातु कवच, तकनीकी मानक, कर, परिवहन और स्थापना लागत का समान होना आवश्यक है। इनकी पुष्टि के बिना दरों के अंतर को अंतिम वित्तीय क्षति नहीं माना जा सकता।

सरकारी ई-बाजार से दरें लीं, लेकिन निविदा उत्तराखण्ड ई-निविदा पोर्टल पर क्यों निकाली गई?

इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण सवाल खरीद प्रक्रिया को लेकर उठाया गया है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि डीपीआर तैयार करने के लिए सरकारी ई-बाजार पोर्टल पर उपलब्ध विद्युत सामग्रियों की दरों को आधार बनाया गया, लेकिन संबंधित निविदा सरकारी ई-बाजार के बजाय उत्तराखण्ड के ई-निविदा पोर्टल पर प्रकाशित की गई।

शिकायत में उत्तराखण्ड शासन के दिनांक 21 जुलाई 2022 के सरकारी ई-बाजार संबंधी शासनादेश का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जिन वस्तुओं एवं सेवाओं की उपयुक्त श्रेणियां सरकारी ई-बाजार पर उपलब्ध हैं, उनकी खरीद में लागू शासनादेश और खरीद नियमों का पालन किया जाना चाहिए।

शिकायतकर्ता ने अधिशासी अधिकारी राजकुमार भारती द्वारा उत्तराखण्ड ई-निविदा पोर्टल के चयन का औचित्य जांचने की मांग की है।

आरोप है कि पोर्टल चयन और निविदा शर्तों के संयुक्त प्रभाव से संभावित प्रतिस्पर्धा सीमित हुई हो सकती है।

हालांकि किसी समेकित आपूर्ति-सह-स्थापना अथवा निर्माण कार्य के लिए उत्तराखण्ड ई-निविदा पोर्टल का उपयोग केवल इसलिए अवैध नहीं हो जाता कि उसकी कुछ सामग्री सरकारी ई-बाजार पर उपलब्ध है।

यह निर्धारित करना आवश्यक होगा कि परियोजना पर कौन-से खरीद नियम लागू थे और दूसरे पोर्टल का चयन किस स्वीकृति के आधार पर हुआ।

₹10 करोड़ से कम की निविदाओं में बाहरी राज्यों की फर्मों पर प्रतिबंध का भी आरोप

शिकायतकर्ता ने निविदा की पात्रता शर्तों पर भी सवाल उठाए हैं।

शिकायत के अनुसार, निविदा में ₹1,000 लाख अर्थात ₹10 करोड़ से कम मूल्य के कार्यों के लिए उत्तराखण्ड के बाहर की फर्मों की भागीदारी सीमित करने वाली शर्त शामिल बताई गई है।

चूंकि गूलरभोज परियोजना की अनुमानित लागत लगभग ₹1.94 करोड़ है, इसलिए यह शर्त इस परियोजना के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकती है।

शिकायतकर्ता ने पूछा है कि ऐसी शर्त किस शासनादेश अथवा अधिप्राप्ति नियमावली के आधार पर लगाई गई और क्या इससे संभावित पात्र बोलीदाताओं की संख्या प्रभावित हुई।

इस शर्त की वैधानिकता का निर्धारण वर्तमान उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली, लागू स्थानीय वरीयता नीति और मूल निविदा दस्तावेज के परीक्षण के बाद ही किया जा सकता है।

पुराने विद्युत पोल और मार्ग प्रकाश उपकरणों का क्या हुआ?

शिकायत में परियोजना के स्थलीय सर्वेक्षण पर भी प्रश्न उठाए गए हैं।

आरोप है कि कई प्रस्तावित स्थानों पर पहले से विद्युत पोल और मार्ग प्रकाश उपकरण स्थापित हैं, लेकिन उपलब्ध डीपीआर में उनकी संख्या, वर्तमान स्थिति, उपयोगिता, प्रतिस्थापन अथवा पुनः उपयोग की योजना का पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया।

यदि पुराने उपकरण उपयोग योग्य थे, तो नए उपकरणों की आवश्यकता और लागत का तकनीकी औचित्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।

शिकायतकर्ता ने पुराने पोलों एवं प्रकाश उपकरणों का संयुक्त भौतिक सत्यापन, परिसंपत्ति पंजिका, भंडार पंजिका और पूर्व भुगतान अभिलेखों की जांच कराने की मांग की है।

भौगोलिक स्थान अंकित छायाचित्रों, स्थलीय सर्वेक्षण और तकनीकी स्वीकृति पर भी सवाल

शिकायत के अनुसार, डीपीआर में प्रस्तावित कार्यस्थलों के लिए पर्याप्त भौगोलिक स्थान अंकित छायाचित्र, जीपीएस स्थान विवरण, स्थलवार सर्वेक्षण और वास्तविक आवश्यकता के दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई है।

यह जांच कराने की मांग की गई है कि क्या डीपीआर तैयार करने से पहले संबंधित अभियंताओं ने प्रत्येक स्थल का निरीक्षण किया था और किस आधार पर पोल, केबल, पैनल तथा अन्य उपकरणों की मात्रा निर्धारित की गई।

इसके अलावा उत्तराखण्ड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के विद्युत पोलों और लोक निर्माण विभाग की सड़कों अथवा संबंधित परिसंपत्तियों पर कार्य प्रस्तावित होने की स्थिति में आवश्यक अनुमति एवं अनापत्ति प्रमाणपत्र का सत्यापन कराने की मांग भी की गई है।

सीपीडब्ल्यूडी, यूपीसीएल, यूजेवीएनएल और उत्तर प्रदेश की दर अनुसूचियों से तुलना की मांग

शिकायतकर्ता ने परियोजना की प्रत्येक मद का स्वतंत्र दर विश्लेषण कराने की मांग की है।

इसके लिए केंद्रीय लोक निर्माण विभाग की विद्युत एवं यांत्रिक दर अनुसूची, उत्तराखण्ड लोक निर्माण विभाग की दर अनुसूची, उत्तराखण्ड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड की संबंधित विभागीय दरें, उत्तराखण्ड जल विद्युत निगम लिमिटेड की दर अनुसूची, पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन ऑफ उत्तराखण्ड लिमिटेड की उपलब्ध दरें तथा उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग एवं संबंधित विद्युत निगमों की दर अनुसूचियों को तुलनात्मक आधार बनाने का सुझाव दिया गया है।

साथ ही सरकारी ई-बाजार पर तुलनीय उत्पादों की दरें और निर्माता कंपनियों के वास्तविक थोक कोटेशन प्राप्त करने की मांग की गई है।

इस तुलना में प्रत्येक मद का सामग्री कोड, दर अनुसूची का वर्ष, तकनीकी विनिर्देश, इकाई, वस्तु एवं सेवा कर, परिवहन, स्थापना एवं वारंटी शामिल करना आवश्यक होगा।

सर्वोच्च न्यायालय के निविदा संबंधी महत्वपूर्ण निर्णयों का भी हवाला

शिकायत के लिए तैयार विधिक परिशिष्ट में सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया गया है।

इनमें टाटा सेल्युलर बनाम भारत संघ, जगदीश मंडल बनाम ओडिशा राज्य, मिशिगन रबर बनाम कर्नाटक राज्य, एफकॉन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाम नागपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन तथा सिल्पी कंस्ट्रक्शंस कॉन्ट्रैक्टर्स बनाम भारत संघ जैसे निर्णय शामिल हैं।

इन निर्णयों में सरकारी निविदाओं के संदर्भ में प्रशासनिक विवेकाधिकार, निष्पक्षता, सार्वजनिक हित, तकनीकी मूल्यांकन तथा न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं पर सिद्धांत स्पष्ट किए गए हैं।

इन फैसलों से किसी विशेष निविदा में भ्रष्टाचार स्वतः सिद्ध नहीं होता, लेकिन वे मनमानी, पक्षपात या नियमविरुद्ध निर्णयों की कानूनी जांच के लिए प्रासंगिक सिद्धांत प्रदान करते हैं।

उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में बाहरी राज्य की फर्मों की निविदा भागीदारी से संबंधित ए.एम.टी. बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम उत्तराखण्ड राज्य प्रकरण को भी संभावित संदर्भ के रूप में चिह्नित किया गया है।

हालांकि इस फैसले की वर्तमान निविदा पर वास्तविक प्रयोज्यता का परीक्षण जरूरी होगा।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और प्रतिस्पर्धा कानून के तहत जांच की मांग

शिकायतकर्ता ने कहा है कि यदि स्वतंत्र जांच में अनुचित लाभ, आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी, कूटरचना अथवा मिलीभगत के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई की जानी चाहिए।

इसके लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, भारतीय न्याय संहिता, 2023 और प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के प्रासंगिक प्रावधानों का परीक्षण करने की मांग की गई है।

विशेष रूप से फर्मों के बीच संभावित बोली-मिलीभगत और अधिकारियों द्वारा किसी विशेष फर्म को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोपों की जांच पर जोर दिया गया है।

कितनी हो सकती है संभावित सरकारी वित्तीय क्षति?

परियोजना की कुल अनुमानित लागत ₹1.94 करोड़ से अधिक बताई गई है, लेकिन शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर अभी वास्तविक सरकारी वित्तीय क्षति की निश्चित राशि निर्धारित नहीं की जा सकती।

इसके लिए डीपीआर की प्रत्येक मद की स्वीकृत मात्रा, वास्तविक तकनीकी विनिर्देश, तुलनीय सरकारी अथवा बाजार दर, कार्यादेश दर और भुगतान की स्थिति का परीक्षण आवश्यक होगा।

यदि जांच में ऊंची दरों के कारण अतिरिक्त भुगतान प्रमाणित होता है, तभी वास्तविक आर्थिक क्षति और जिम्मेदारी निर्धारित की जा सकेगी।

उच्चस्तरीय जांच, अभिलेख सुरक्षित रखने और भुगतान की समीक्षा की मांग

शिकायतकर्ता ने मुख्य सचिव, शहरी विकास विभाग, जिलाधिकारी ऊधम सिंह नगर और सतर्कता विभाग से पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है।

इसके साथ ही डीपीआर की मूल प्रति, तीनों कोटेशन, वस्तु एवं सेवा कर संबंधी दस्तावेज, सरकारी ई-बाजार की उत्पाद प्रविष्टियां, मूल उपकरण निर्माताओं की मूल्य सूचियां, निविदा दस्तावेज, तकनीकी एवं वित्तीय बोलियां, पत्रावली टिप्पणियां, कार्यादेश, माप पुस्तिका, भंडार पंजिका और भुगतान अभिलेख सुरक्षित रखने का अनुरोध किया गया है।

शिकायत में यह भी मांग की गई है कि जांच पूरी होने तक, विधिसम्मत परिस्थितियों में, विवादित परियोजना के आगे के भुगतान एवं कार्यादेशों की समीक्षा की जाए।

अनियमितता प्रमाणित होने पर संबंधित अधिकारियों एवं फर्मों की जवाबदेही निर्धारित कर नियमानुसार आर्थिक वसूली तथा विभागीय या आपराधिक कार्रवाई की जाए।

सबसे बड़ा सवाल — क्या परियोजना की लागत वास्तविक आवश्यकता और प्रतिस्पर्धात्मक दरों पर आधारित है?

नगर पंचायत गूलरभोज की इस परियोजना में उठे सवाल केवल किसी एक विद्युत पोल, नियंत्रण पैनल अथवा केबल की कीमत तक सीमित नहीं हैं।

मामला डीपीआर तैयार करने वाली फर्म के चयन से शुरू होकर दर निर्धारण, तकनीकी आवश्यकताओं, मौजूदा परिसंपत्तियों के उपयोग, खरीद पोर्टल के चयन और निविदा की पात्रता शर्तों तक पहुंचता है।

यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों का दस्तावेजी सत्यापन होता है, तो यह मामला सरकारी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता और सार्वजनिक धन के मितव्ययी उपयोग से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न बन सकता है।

फिलहाल यह पूरा मामला शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों और जांच की मांग पर आधारित है। संबंधित अधिकारियों, डीपीआर तैयार करने वाली फर्म तथा अन्य पक्षों का आधिकारिक स्पष्टीकरण प्राप्त होने के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा, उत्तराखण्ड शासन और जिला प्रशासन इस लगभग ₹1.94 करोड़ की परियोजना की स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय जांच कराते हैं या नहीं।

गूलरभोज के अधिशासी अधिकारी राजकुमार भारती की पूर्व कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल, करोड़ों रुपये की निविदाओं और खरीद प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग………

शिकायतकर्ता ने नगर पंचायत गूलरभोज में अधिशासी अधिकारी के पद पर कार्यरत रहे राजकुमार भारती की पूर्व कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि उनके विरुद्ध पूर्व में भी भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं, सरकारी धन के कथित दुरुपयोग तथा ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने से संबंधित अनेक शिकायतें की जा चुकी हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, नगर पंचायत गूलरभोज में लगभग ₹12 से ₹15 करोड़ की सफाई व्यवस्था एवं घर-घर कूड़ा संग्रहण (डोर-टू-डोर) से संबंधित निविदा प्रक्रिया ऑनलाइन ई-निविदा के बजाय ऑफलाइन माध्यम से संपन्न कराए जाने का आरोप है। जिसकी वैधानिकता एवं वित्तीय पारदर्शिता की जांच आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त वाटर कूलर की खरीद से संबंधित कथित अनियमितताओं की शिकायत पर जांच गतिमान होने का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि नगर पंचायत में डस्टबिन की खरीद प्रचलित बाजार दरों से लगभग तीन गुना अधिक कीमतों पर की गई, जिससे सरकारी धन को संभावित वित्तीय क्षति पहुंचने की आशंका है।

इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता के अनुसार राजकुमार भारती के पूर्व में नगर पंचायत लंढौरा, जनपद हरिद्वार में तैनाती के दौरान भी कथित अत्यधिक दरों पर खरीद, ठेकेदारों के साथ संभावित मिलीभगत, सरकारी धन के गबन एवं दुरुपयोग तथा निजी ठेकेदारों को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाने से संबंधित प्रकरण में जांच गतिमान होने की जानकारी सामने आई थी।

शिकायतकर्ता ने मांग की है कि राजकुमार भारती के कार्यकाल से संबंधित इन सभी पूर्व शिकायतों, जांच आदेशों, जांच की वर्तमान स्थिति, निविदा अभिलेखों, भुगतान विवरणों तथा संबंधित अधिकारियों एवं ठेकेदारों की भूमिका का स्वतंत्र सत्यापन कराया जाए। साथ ही यह भी जांच की जाए कि पूर्व में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों और लंबित जांचों की स्थिति में संबंधित अधिकारी की वित्तीय एवं प्रशासनिक जिम्मेदारियों की विभागीय स्तर पर क्या समीक्षा की गई थी।

शिकायतकर्ता का कहना है कि गूलरभोज की वर्तमान ₹1.94 करोड़ की परियोजना को पूर्व शिकायतों से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि समस्त मामलों की स्वतंत्र उच्चस्तरीय तकनीकी, वित्तीय एवं सतर्कता जांच कराई जानी चाहिए। हालांकि ये सभी आरोप शिकायतकर्ता द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित हैं तथा इनकी स्वतंत्र पुष्टि, जांच की वास्तविक स्थिति और संबंधित अधिकारी का पक्ष प्राप्त होना अभी शेष है। किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत अथवा आपराधिक जिम्मेदारी जांच में प्रमाणित तथ्यों के आधार पर ही निर्धारित की जानी चाहिए।

 

गूलरभोज के अलावा गदरपुर और दिनेशपुर में भी अंकुर शर्मा द्वारा तैयार डीपीआर पर सवाल, तीनों परियोजनाओं में एक जैसी सामग्री और बिना स्थलीय सर्वेक्षण के रिपोर्ट तैयार करने का आरोप…….

शिकायतकर्ता ने एक और गंभीर मामला उठाते हुए आरोप लगाया है कि नगर पंचायत गूलरभोज के अतिरिक्त नगर पालिका परिषद गदरपुर तथा नगर पंचायत दिनेशपुर में भी अंकुर शर्मा द्वारा विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की गई हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि तीनों नगर निकायों की डीपीआर में अत्यधिक समानताएं हैं तथा स्थानीय परिस्थितियों, वास्तविक आवश्यकताओं और अलग-अलग कार्यस्थलों के अनुरूप स्वतंत्र तकनीकी सर्वेक्षण करने के बजाय कथित रूप से एक ही डीपीआर की सामग्री को दूसरी डीपीआर में नकल करके इस्तेमाल किया गया है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, इन डीपीआर को तैयार करते समय संबंधित कार्यस्थलों का पर्याप्त भौतिक निरीक्षण, भौगोलिक स्थान अंकित छायाचित्रों (जियो-टैगिंग), जीपीएस आधारित स्थल विवरण, पहले से स्थापित विद्युत पोलों एवं प्रकाश उपकरणों की वास्तविक स्थिति तथा स्थलवार तकनीकी आवश्यकताओं का समुचित परीक्षण किए जाने पर गंभीर संदेह है। आरोप है कि बिना पर्याप्त स्थलीय सर्वेक्षण के ही विद्युत पोल, एलईडी मार्ग प्रकाश उपकरण, केबल, नियंत्रण पैनल तथा अन्य सामग्रियों की मात्रा और अनुमानित लागत निर्धारित की गई।

शिकायतकर्ता ने डीपीआर तैयार करने वाली फर्म के साथ-साथ संबंधित कार्यदायी संस्था, जिला स्तरीय तकनीकी समिति तथा डीपीआर की तकनीकी जांच एवं स्वीकृति (टीएसटी) से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कराने की मांग की है। उनका सवाल है कि यदि तीन अलग-अलग नगर निकायों की डीपीआर में एक जैसी तकनीकी सामग्री, दरें और कार्य विवरण पाए जाते हैं, तो संबंधित तकनीकी समितियों ने स्थलवार वास्तविक आवश्यकता, दरों की उपयुक्तता और सर्वेक्षण अभिलेखों का सत्यापन किस आधार पर किया?

शिकायतकर्ता का कहना है कि उनके द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत शासन एवं शहरी विकास विभाग से संबंधित सभी 15 कार्यों की डीपीआर तथा उनसे जुड़े अभिलेख मांगे गए हैं। सूचना प्राप्त होने के बाद सभी डीपीआर का आपस में तुलनात्मक परीक्षण कर सामग्री की समानता, दरों में संभावित अनियमितताओं, स्थलीय सर्वेक्षण, जियो-टैगिंग, तकनीकी स्वीकृतियों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका का दस्तावेजी विश्लेषण किया जाएगा।

शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया है कि अन्य डीपीआर एवं संबंधित अभिलेख प्राप्त होने के बाद, यदि उनमें कथित वित्तीय अनियमितताओं, नियमविरुद्ध स्वीकृतियों, सरकारी धन के दुरुपयोग अथवा संभावित मिलीभगत के पर्याप्त साक्ष्य सामने आते हैं, तो संबंधित प्रकरणों में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के समक्ष विधिसम्मत याचिका प्रस्तुत कर निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच, सरकारी धन की सुरक्षा तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों एवं संबंधित फर्मों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की मांग की जाएगी।

हालांकि डीपीआर की कथित समानता, सर्वेक्षण में कमी और तकनीकी स्वीकृति संबंधी आरोपों की पुष्टि मूल अभिलेखों के स्वतंत्र परीक्षण के बाद ही की जा सकेगी।